Thursday, August 30, 2012

एक गुमनाम लेखक की डायरी-11

मित्र लोग कहते हैं कि मैं कवि हो गया हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि वे मुझे 'कवि' व्यंग्य में नहीं कहते। उनकी मंशा पर संदेह करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन मेरे मन में बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या सचमुच कुछ कविताएं लिखने से कोई कवि हो जाता है? 


मुझे लगता है कि एक पूरी उम्र बीत जाती है कविता लिखते-लिखते लेकिन फिर भी कुछ एक लोग होते हैं जो कवि बन पाते हैं। सिर्फ कविता लिखने से कोई कवि नहीं बनता। हो सकता है कि कुछ लोग दो चार कविताएं लिखकर और जोड-तोड़ कर के पुरस्कार वगैरह पा जाएं और अपनी प्रयोजित चर्चा करवा लें, लेकिन जो सही मायने में कवि होता है, वह समय की सीमा पार कर बार-बार उभर कर सामने आता है। इस समय चाहे वह किसी खोह में दबा हो, लेकिन समय आने पर वह और उसकी कविता लोगों के लिए ताकत बन कर  उभरेगी - उभरती है।

कवि  कौन है, इसके फैसले को इतिहास पर छोड़ देना चाहिए। इतिहास का हंटर सबसे मजबूत होता है, कुछ बातों को छोड़कर हमें इतिहास पर भरोसा करना चाहिए कि वह न्याय करेगा। हां, यह जरूर याद रखना चाहिए कि इतिहास भी अंततः एक मनुष्य ही लिखता है। लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इतिहास की कुछ घटनाएं मनुष्य के कमजोर हाथ में नहीं समातीं, वह अपने तरीके से घटित होती हैं। और उनका अपना तानाशाही रवैया भी होता है।



इसलिए जब कभी मुझे कवि कहता है तो मैं झेंप जाता हूं। सिर्फ यह कारण नहीं कि अबतक की मेरी लिखी हुई कविताएं मुझे उस तरह संतुष्ट नहीं करतीं, बल्कि इसके पीछे कई अन्य कारण भी काम करते हैं- कुछ कारणों के बारे में मुझे खुद भी कुछ पता नहीं।

जब-जब मुक्तिबोध और निराला सरीखे कवियों को सामने पाता हूं, मेरा अब तक का लिखा-पढ़ा नाखून के बराबर भी नहीं ठहरता। यह मेरी विनम्रता नहीं है कि मैं ऐसा कह रहा हूं, बल्कि यह एक ऐसी सच्चाई है, जिससे मुझे हर रोज लागातार लोहा लेना पड़ता है।

मैं उन लोगों को प्रणाम करता हूं जो मुझसे भी अधिक विपरीत परिस्थियों में लिख रहे हैं, जिन्हें कोई नहीं जानता। जिन्हें अपने को जनाने की भूख भी नहीं। मैं कल शायद कवि बन भी जाऊं लेकिन वे लोग जो बिना किसी स्वार्थ के कला के कर्म में लगे हुए हैं, उनके सामने यह यह माथ हमेशा नत रहेगा..।

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